कुछ यात्राएँ सिर्फ सफर नहीं, यादें बन जाती हैं
भारत में धार्मिक यात्राओं की अपनी अलग ही बात होती है। मंदिर तक पहुँचने का सफर केवल किलोमीटरों का नहीं होता, बल्कि मन और आस्था का भी होता है। 15 मार्च की मेरी मुज़फ्फरपुर से थावे मंदिर की यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही।
इस बार मेरे साथ मेरी पत्नी और परिवार के दो अन्य सदस्य भी थे। कई दिनों से हम लोग माँ थावेवाली के दर्शन की योजना बना रहे थे। सब कुछ तय हो चुका था, लेकिन हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि यात्रा शुरू होने से पहले ही प्रकृति हमारी परीक्षा लेने वाली है।
आज भी जब मैं उस सुबह को याद करता हूँ तो सबसे पहले घना कोहरा याद आता है।
सुबह 6 बजे ऐसा कोहरा कि लगा यात्रा रद्द करनी पड़ेगी
14 मार्च की रात तक मौसम बिल्कुल सामान्य था। इसलिए हमें विश्वास था कि अगली सुबह आराम से निकल जाएंगे।
लेकिन 15 मार्च की सुबह लगभग 6 बजे जैसे ही मैं बाहर निकला, पूरा वातावरण सफेद धुंध से ढका हुआ था। सामने कुछ मीटर दूर तक भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
मैंने पहले कभी इतने घने कोहरे में लंबी दूरी की ड्राइव नहीं की थी। सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह थी कि इस बार मैं अकेला नहीं था, बल्कि मेरे साथ परिवार भी था।
कुछ देर के लिए मन में आया कि शायद आज का कार्यक्रम रद्द कर देना चाहिए।
लेकिन फिर हमने एक-दूसरे की तरफ देखा और एक ही बात कही—
"माँ ने बुलाया है तो सुरक्षित पहुँच भी जाएँगे।"
यही सोचकर हमने यात्रा शुरू करने का फैसला किया।
सुबह 7:30 बजे मुज़फ्फरपुर से शुरुआत
कोहरे के कारण तैयारी और निकलने में थोड़ा समय लग गया।
आखिरकार सुबह लगभग 7 से 7:30 बजे हम अपनी Maruti S-Presso VXI+ AGS से मुज़फ्फरपुर से थावे मंदिर के लिए निकल पड़े।
कार की फॉग लाइट और हेडलाइट दोनों चालू थीं।
मैं सड़क पर पूरी तरह ध्यान देकर ड्राइव कर रहा था।
जहाँ विजिबिलिटी कम होती, वहाँ कार की स्पीड 30–40 km/h कर देता और जहाँ सड़क थोड़ी साफ मिलती, वहाँ धीरे-धीरे स्पीड बढ़ा देता।
यात्रा के शुरुआती एक घंटे में रोमांच से ज्यादा जिम्मेदारी महसूस हो रही थी।
धीरे-धीरे मौसम ने भी हमारा साथ देना शुरू कर दिया
मुज़फ्फरपुर से निकलने के बाद कुछ दूरी तक कोहरा लगातार बना रहा।
लेकिन जैसे-जैसे हम गोपालगंज की ओर बढ़ते गए, मौसम बदलने लगा।
धीरे-धीरे धुंध कम होने लगी।
और फिर एक समय ऐसा आया जब सामने खुला नीला आसमान और हल्की सुनहरी धूप दिखाई देने लगी।
उस समय जो राहत महसूस हुई, उसे शब्दों में बताना मुश्किल है।
अब ड्राइव पहले से कहीं ज्यादा आसान और आनंददायक हो चुकी थी।
सड़क के दोनों ओर फैले खेत, छोटे-छोटे गाँव, सुबह की ताजी हवा और खुला हाईवे पूरे सफर को बेहद खूबसूरत बना रहे थे।
कार के अंदर माता रानी के भजन चल रहे थे और बाहर प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई दे रही थी।
यही रोड ट्रिप की सबसे बड़ी खूबसूरती होती है।
मंजिल जितनी सुंदर होती है, उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत रास्ता होता है।
सुबह 10:30 बजे पहुँचे माँ थावेवाली के दरबार
लगभग साढ़े दस बजे हम थावे मंदिर पहुँच गए।
मंदिर के बाहर अच्छी पार्किंग व्यवस्था थी।
हमने अपनी कार पार्क की।
कार से उतरते ही मंदिर की घंटियों की आवाज़ और "जय माता दी" के जयकारे सुनाई देने लगे।
ऐसा लगा कि पूरी यात्रा सफल हो गई।
सबसे पहले हमने मंदिर के बाहर की दुकान से प्रसाद खरीदा।
फिर सीधे दर्शन के लिए लाइन में लग गए।
रविवार होने के कारण काफी भीड़ थी
हम जिस दिन पहुँचे वह रविवार था।
इस कारण स्थानीय श्रद्धालुओं की भी अच्छी-खासी भीड़ थी।
लाइन काफी लंबी थी लेकिन व्यवस्था अच्छी थी।
लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और किसी प्रकार की अव्यवस्था देखने को नहीं मिली।
मंदिर परिसर में हर तरफ भक्ति का माहौल था।
कहीं माता के भजन चल रहे थे, कहीं श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे।
ऐसे माहौल में इंतजार भी बोझ नहीं लगता।
बल्कि मन और अधिक शांत हो जाता है।

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